Vaadi Samvadi Vivadi Swar

byHare Krishna Sharma

Fifty bold essays on Hindu society, history, nationalism, and dharma — grounded in the Gita, Vedas, and the tradition of rigorous debate.

Overview

Sanatana Dharma has always distinguished itself from other traditions by treating debate — vaad, vivaad, samvaad — as a legitimate path to truth, not a threat to faith. Hare Krishna Sharma's fifty-chapter work takes that tradition as its organising principle, engaging Hindu society's current condition not with consolation but with rigorous argument. Drawing on the Gita, the Vedas, the Upanishads, and the long history of shastrarth, Sharma examines how Hinduism came to be misread, misrepresented, and in some cases betrayed — and what intellectual tools the tradition itself offers for responding.

The book moves across a wide range of subjects: historical distortions in the telling of Hindu history, the social and philosophical challenges of religious conversion, cultural self-defence in a globalised context, nationalism as understood through a dharmic lens, and the role Sanatana Dharma might play in contemporary world affairs. Each of the fifty chapters can be read independently, making the book as useful for selective engagement as for cover-to-cover reading.

For readers who take religion seriously as a domain of thought rather than mere sentiment, and who want to understand the contemporary challenges facing Hindu society through the framework of the tradition itself, this is a substantive and uncompromising text.

-:किताब के बारे में:- "वादी-संवादी-विवादी स्वर" लेखक हरे कृष्ण शर्मा द्वारा रचित एक वैचारिक, वैदिक और राष्ट्रचेतना से ओत-प्रोत कृति है। यह पुस्तक सनातन धर्म की उस प्राचीन परम्परा को सामने लाती है, जिसमें वाद, विवाद और संवाद को सत्य की खोज का अनिवार्य साधन माना गया है। पुस्तक में धर्म, इतिहास, राजनीति, राष्ट्र, संस्कृति और समकालीन सामाजिक-वैचारिक चुनौतियों पर लेखक ने निर्भीक और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि सनातन (हिन्दू) धर्म ही ऐसा धर्म है जो मतभिन्नता को स्वीकार करता है और शास्त्रार्थ के माध्यम से आत्मपरिष्कार की अनुमति देता है। कृति में कुल 50 स्वर (अध्याय) हैं, जिनमें लेखक ने हिन्दू समाज की वर्तमान स्थिति, ऐतिहासिक विकृतियों, वैचारिक संघर्षों, राष्ट्रवाद, धर्मान्तरण, सांस्कृतिक आत्मरक्षा तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सनातन धर्म की भूमिका जैसे विषयों पर विचार किया है। प्रत्येक अध्याय स्वतंत्र रूप से भी पठनीय है। लेखक ने श्रीकृष्ण के गीता-उपदेशों, वेदों, उपनिषदों तथा भारतीय दार्शनिक परम्परा के आधार पर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि धर्म केवल आस्था नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध और कर्म का नाम है। पुस्तक का उद्देश्य पाठक को वैचारिक रूप से सजग करना, प्रश्न करने की क्षमता विकसित करना तथा राष्ट्र और धर्म के प्रति उत्तरदायित्व का बोध कराना है। "वादी-संवादी-विवादी स्वर" उन पाठकों के लिए एक विचारोत्तेजक ग्रंथ है जो समाज, धर्म और राष्ट्र के प्रश्नों पर गम्भीर मंथन करना चाहते हैं और सनातन दृष्टि से समकालीन यथार्थ को समझना चाहते हैं।

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Hare Krishna Sharma

-:ABOUT THE AUTHOR:- लेखक इस समय उम्र से बुजुर्ग अवश्य हैं परन्तु देशभक्ति और राष्ट्रीय कार्यो में नवयुवक जैसे ही उत्साही है। आगरा विश्वविद्यालय से बी ए की डिग्री प्राप्त की है और वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और ज्योतिषाचार्य की डिग्री प्राप्त कीहै। मनोविज्ञान और दर्शन और धार्मिक लेखन भी उनके प्रिय विषय रहे है। आजीविका के लिए ये ज्योतिष को प्रयोग में लाते है। क्रान्तिकारी और देशभक्ति पूर्ण लेखन इनकी होबी है। लेखन का प्रारम्भ इन्होंने धर्म के विकृत होते जा रहे स्वरूप के बारे मे चार पुस्तकैं लिख कर किया। तदुपरान्त उनका राष्ट्रवादी लेखन सतत चालू है और विदेशी सरकारों को भी सनातन हिन्दू धर्म को अपना राष्ट्रधर्म बनाने को सतत प्रेरित करते रहते हैं। हिन्दू धर्म ही सभ्यता, मानवीयता, अहिंसा, सत्य और सद्भाव का प्रचारक था है और रहेगा! उनसे जब पूछा गया कि अकेला चना कहां तक भाड को फोड सकता है। तो उनका उत्तर था कि भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रवर्तक अकेले मंगल पांडे थे और दूसरे सफल स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने वाले एकमात्र सफल महापुरुष नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। हालांकि बाद में कुछ अंग्रेजों के चापलूसो ने स्वतंत्रता का श्रेय स्वयं ले लिया और स्वतंत्रता को अधूरा कर दिया है। इसे समझना चाहिए और तदनुसार अपने कर्त्तव्य का निर्धारण करके अपने कर्म में लगना चाहिए। विजय अवश्य मिलेगी। कर्म करो तो फल मिलता है आज नहीं तो कलमिलता है जितना गहराअधिककुंआहो उतना मीठा जल मिलता है। जीवन के हर कठिनप्रश्न का जीवन से ही हल मिलता है। हमारा उद्देश्य कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ( विश्व को सभ्य और सुसंस्कृत बनायै)

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