Naxalwaad
Two eyewitnesses to Bihar's Naxal caste wars examine why Maoist ideology outlasts its armed movements — and what can end it.
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अवकाश-प्राप्त न्यायाधीश एवं लोकतंत्र सेनानी श्री बृजेश सिंह का जन्म 1955 में रायबरेली उ.प्र. में हुआ। उनका विवाह श्रीमती सुशीला सिंह, आर्ट ऑफ़ लिविंग की प्रशिक्षक, के साथ 1974 में हुआ। 1975 में आपातकाल के दौरान आप जेल गए। 1978 में फिरोज गाँधी महाविद्यालय, रायबरेली, छात्र संघ के महासचिव चुने गए। तत्कालीन केन्द्रिय स्वास्थ्य मंत्री श्री राज नारायण के साथ दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे। जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार गिरने के बाद 1983 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक हुए। 22वीं बैच में बिहार में सिविल जज के पद पर आप का चयन हुआ। 1996 में समाज शास्त्र से एम.ए. किया। 2001 में पति-पत्नी आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रशिक्षक बने। 2006 में झारखण्ड जजेज एसोसिएशन के महासचिव एवं अखिल भारतीय जजेज़ एसोसिएशन के कोशाध्यक्ष मनोनीत किए गए। आपने साम्यवादी विचारधारा से ओतप्रोत पुस्तक माओवाद एक सांस्कृतिक क्रांति लिखी। आपका विश्वास है कि भारत का नक्सलवाद चीन प्रायोजित है। उनका दृढ़ विश्वास यह भी था कि नक्सलवाद समाधान का रास्ता गुरूदेव निकालेंगे। छात्र राजनीति के दौरान साम्यवादी साहित्य पढ कऱ और साम्यवादी चरित्र से बखूबी परिचित होने के अतिरिक्त, आपने गया जिले की नक्सलवाद-बनाम-उच्चवर्ग की रणवीर सेना के बीच खूनी नरसंहार की घटना को बहुत नजदीक से देखा है। 2001 में लेखकद्वय ने बिहार के नक्सलवादी जातीय संघर्ष (रणवीर सेना बनाम दलित आदिवासी सेना) को ऋषीकेश में गुरूदेव द्वारा संघर्ष विराम करवाते देखा। 2001 के बाद नक्सलवादी जातीय सामूहिक नरसंहार खत्म हुए, किंतु 2004 में भा.क.पा. (माओवादी) का गठन होने के बाद नक्सलवादी बनाम सरकार के सशस्त्र बल के बीच खूनी संघर्ष शुरू हो गया। फिर गुरूदेव के संकल्प से 2009 से नक्सलवादियों की इस सशस्त्र खूनी क्रांति का पटाक्षेप होते हुए भी देखा है। कई रोचक एवं चुनौतीपूर्ण घटनाक्रमों से दो-चार होते हुए, जिसके दौरान उन्हें न सिर्फ गुरूदेव के संकल्प का दर्शन हुआ और उनका र्मागदर्शन प्राप्त हुआ बल्कि झारखण्ड सरकार के गृहसचिव, प्रमुख सचिव एवं पुलिस मुख्यालय का भी सहयोग मिला, लेखकद्वय ये मानते है कि गुरूदेव के इस अभियान में उन्होंने भी अपनी गरिमा की सीमा रेखा को पार करते हुए अभियान के निमित्त बने। बकौल सुशीला जी, 'गुरूदेव ने हमें नक्सलवादी बना दिया'। सम्प्रति, गुरूदेव के निर्देश पर श्री सिंह च्मवचसमश् न्दपजल वित ब्पअपस स्पइमतजपमे ;च्न्ब्स्द्ध के साथ भा.क.पा. (माओवादी) को वार्ता की मेज पर लाने को प्रयासरत है, ताकि माओवादी विचारधारा का भी अंत हो जाए।
अवकाश-प्राप्त न्यायाधीश एवं लोकतंत्र सेनानी श्री बृजेश सिंह का जन्म 1955 में रायबरेली उ.प्र. में हुआ। उनका विवाह श्रीमती सुशीला सिंह, आर्ट ऑफ़ लिविंग की प्रशिक्षक, के साथ 1974 में हुआ। 1975 में आपातकाल के दौरान आप जेल गए। 1978 में फिरोज गाँधी महाविद्यालय, रायबरेली, छात्र संघ के महासचिव चुने गए। तत्कालीन केन्द्रिय स्वास्थ्य मंत्री श्री राज नारायण के साथ दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थे। जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार गिरने के बाद 1983 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक हुए। 22वीं बैच में बिहार में सिविल जज के पद पर आप का चयन हुआ। 1996 में समाज शास्त्र से एम.ए. किया। 2001 में पति-पत्नी आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रशिक्षक बने। 2006 में झारखण्ड जजेज एसोसिएशन के महासचिव एवं अखिल भारतीय जजेज़ एसोसिएशन के कोशाध्यक्ष मनोनीत किए गए। आपने साम्यवादी विचारधारा से ओतप्रोत पुस्तक माओवाद एक सांस्कृतिक क्रांति लिखी। आपका विश्वास है कि भारत का नक्सलवाद चीन प्रायोजित है। उनका दृढ़ विश्वास यह भी था कि नक्सलवाद समाधान का रास्ता गुरूदेव निकालेंगे। छात्र राजनीति के दौरान साम्यवादी साहित्य पढ कऱ और साम्यवादी चरित्र से बखूबी परिचित होने के अतिरिक्त, आपने गया जिले की नक्सलवाद-बनाम-उच्चवर्ग की रणवीर सेना के बीच खूनी नरसंहार की घटना को बहुत नजदीक से देखा है। 2001 में लेखकद्वय ने बिहार के नक्सलवादी जातीय संघर्ष (रणवीर सेना बनाम दलित आदिवासी सेना) को ऋषीकेश में गुरूदेव द्वारा संघर्ष विराम करवाते देखा। 2001 के बाद नक्सलवादी जातीय सामूहिक नरसंहार खत्म हुए, किंतु 2004 में भा.क.पा. (माओवादी) का गठन होने के बाद नक्सलवादी बनाम सरकार के सशस्त्र बल के बीच खूनी संघर्ष शुरू हो गया। फिर गुरूदेव के संकल्प से 2009 से नक्सलवादियों की इस सशस्त्र खूनी क्रांति का पटाक्षेप होते हुए भी देखा है। कई रोचक एवं चुनौतीपूर्ण घटनाक्रमों से दो-चार होते हुए, जिसके दौरान उन्हें न सिर्फ गुरूदेव के संकल्प का दर्शन हुआ और उनका र्मागदर्शन प्राप्त हुआ बल्कि झारखण्ड सरकार के गृहसचिव, प्रमुख सचिव एवं पुलिस मुख्यालय का भी सहयोग मिला, लेखकद्वय ये मानते है कि गुरूदेव के इस अभियान में उन्होंने भी अपनी गरिमा की सीमा रेखा को पार करते हुए अभियान के निमित्त बने। बकौल सुशीला जी, 'गुरूदेव ने हमें नक्सलवादी बना दिया'। सम्प्रति, गुरूदेव के निर्देश पर श्री सिंह च्मवचसमश् न्दपजल वित ब्पअपस स्पइमतजपमे ;च्न्ब्स्द्ध के साथ भा.क.पा. (माओवादी) को वार्ता की मेज पर लाने को प्रयासरत है, ताकि माओवादी विचारधारा का भी अंत हो जाए।
Two eyewitnesses to Bihar's Naxal caste wars examine why Maoist ideology outlasts its armed movements — and what can end it.
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