Bharat Ek Desh Hai Company Nhi

bySusmit Kumar

How imported Reaganomics and the dollar's reserve-currency privilege kept India in a trade-deficit trap for three decades.

Overview

Since this book first appeared in 2018, not a single imported economist has occupied any of India's three top economic positions — RBI Governor, Chief Economic Adviser, or Vice-Chairman of NITI Aayog. That is either coincidence or consequence, and Susmit Kumar argues it is the latter.

The argument moves outward from India to the global monetary order. The US dollar became the world's reserve currency not through market competition but through geopolitical circumstance — the ruins of World War II-era Europe and the near-total subjugation of the colonial world. Ever since, America has financed its deficits by printing its own currency, exchanging paper for real goods while exporting countries — including India — are left holding US treasury bonds. Kumar marshals 110 charts and tables to show why three decades of liberalisation have left India without a single year of trade surplus, while Germany, Japan, and China have accumulated vast surpluses by rejecting the Reaganomics prescriptions that American economists exported. He traces the dollar's path toward weaponisation, China's accumulation of four trillion dollars in foreign reserves, and the accelerating de-dollarisation that threatens to trigger a global recession deeper than the 1930s.

For readers who want economic analysis that treats India as a sovereign nation rather than a client state, and who are willing to have received wisdom tested against data, this book offers a systematic and well-documented challenge to mainstream consensus.

एक पुस्तक जिसके 2018 में पहली बार प्रकाशित होने के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन सर्वोच्च पदों (आरबीआई गवर्नर, मुख्य आर्थिक सलाहकार और नीति आयोग के उपाध्यक्ष) पर एक भी आयातित अर्थशास्त्री नियुक्त नहीं किए गए। वैश्विक अर्थव्यवस्था की विवेचना करते हुए आसानी से समझ में आने वाले 110 चार्ट और टेबल के साथ । "कभी-कभी, एक बाहरी व्यक्ति क्षेत्रके विशेषज्ञों से अधिक बेहतर ढंग से आँकड़ों का विश्लेषण कर सकता है ।" - डॉ अरविन्द गुप्ता विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) के तत्कालीन निदेशक और भूतपूर्व उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (पुस्तक के प्रथम संस्करण के आलोक में मार्च 2018 में डॉ सुस्मित कुमार द्वारा दिए गए वार्ता के दौरान परिचय कराते हुए) द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, जब हिटलर का लगभग पूरे यूरोप पर कब्जा था, और यूरोप की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी और उन्हें अपने पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका से बहुत अधिक सहायता की आवश्यकता थी, और जब अधिकतर दूसरे देश उपनिवेशवाद के अधीन थे, तब अमेरिका ने अपनी मुद्रा को वैश्विक मुद्रा बना दिया । जब भी अमेरिका को अपने व्यापार घाटा या बजट घाटा को वित्तपोषित करना होता है, तो वह बस अपनी मुद्रा छाप लेता है । कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री ऐलन एच मेल्टज़र के अनुसार: हम (अमेरिका) कागज के टुकड़ों, जिनको हम बहुत तेजी से छाप सकते हैं, के बदले सस्ते उत्पाद प्राप्त करते हैं । अमेरिकी डॉलर एक पॉन्ज़ी योजना है । चीन और अन्य देशों से अपने आयातों के लिए अमेरिका मात्र अपनी मुद्रा "छाप" लेता है और बदले में निर्यात करने वाले देशों, जिसमें भारत भी शामिल है, को अमेरिका में डॉलर का निवेश करना पड़ता है; या तो अमेरिकी राजकोषीय बॉन्ड में या अमेरिकी शेयर बाजार में । भारत अमेरिका की तरह अपनी मुद्रा छाप कर अपने बजट और व्यापार घाटे को वित्तपोषित नहीं कर सकता । अमेरिका के अतिरिक्त, तीन दूसरी आर्थिक महाशक्तियों (जर्मनी, जापान और चीन) के पास तीन दशकों से अधिक समय से व्यापार अधिशेष (trade surplus) रहा है, जबकि भारत में तीन दशकों के उदारीकरण के बाद भी एक भी वर्ष व्यापार अधिशेष नहीं रहा - इस स्थिति के पीछे हैं "आयातित" अमेरिकी अर्थशास्त्री, जो विनाशकारी "रीगनॉमिक्स" लागू करवाते हैं और उसी का गुणगान करते हैं । भारत कभी भी आर्थिक महाशक्ति तब तक नहीं बन सकता जब तक उसके पास चीन की तरह अधिकाधिक मात्रा में विदेशी मुद्रा जमा नहीं हो जाता है । इसके अलावा भारत को अनेक आयामों में त्वरित तौर पर आत्म-निर्भर होने की आवश्यकता है । अमेरिका में 1980 के दशक से चली आ रही "रीगनॉमिक्स" नीतियों ने अमेरिका को दिवालिया कर दिया है और उसके लगभग राष्ट्रीय निर्माण एवं सेवा क्षेत्र की नौकरियों को दूसरे देश में भेज दिया है । अमेरिकी अर्थशास्त्रियों, प्रबंधन गुरुओं और वॉल स्ट्रीट ने चीन के रूप में एक भस्मासुर खड़ा कर दिया है और अमेरिका को चीन के हाथों बेच दिया है । 1990 के दशक से चीन ने लगातार व्यापार अधिशेष बनाया है और $4 ट्रिलियन ($4 लाख करोड़) विदेशी मुद्रा जमा कर लिया है, और अमेरिकी डॉलर के स्थान पर चीन का युआन वैश्विक मुद्रा बनने की कगार पर है । अमेरिकी पूँजीवाद तेजी से '1991 सोवियत संघ के विखंडन' वाले पल की तरफ अग्रसर है जिसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को 1930 के दशक से भी बड़ी आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ेगा । अनुक्रमणिका: अ आयातित वस्तुओं का असर: आयातित वस्तुओं की छुपी हुई कीमत 21 किसके $1 ट्रिलियन (100 खरब) को चीन एक-बेल्ट-एक-सड़क (OBOR) पर खर्च कर रहा है? 24 ब व्यापार घाटा: व्यापार घाटा: सुरक्षा की तरह देखे जाने की आवश्यकता 29 1980 के उत्तरार्ध में तेल के दामों के गिरने, जर्मन बैंकों के टूटने से गिरा साम्यवाद: रीगन की वजह से नहीं 30 1997 पूर्वी एशियाई आर्थिक संकट 33 2001 अर्जेन्टीना आर्थिक संकट और आईएमएफ 38 2009 यूरो संकट43 आईएमएफ: आई ऐमफिनिश्ड (I'M Finished)47 स अमेरिकी अर्थव्यवस्था: अमेरिकी डॉलर: एक पॉन्जी योजना 55 अमेरिका पर विदेशी कर्ज 59 रीगनॉमिक्स 66 अमेरिकी अर्थव्यवस्था: जल्द ही डूबने को तैयार आज का 'टाइटैनिक'68 अमेरिकी डॉलर और अर्थव्यवस्था पर चीन की जकड़ 77 शेयरधारक पहले: अमेरिकी अर्थव्यवस्था की बर्बादी का कारण 84 अमेरिका में मध्यमवर्ग का नेस्तनाबूद होना 98 इंटरनेट तकनीक का आगमन और वॉलस्ट्रीट 103 आय में असमानता: अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक त्रासदी 110 क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ और अमेरिकी रेटिंग121 वॉलस्ट्रीट फल (सामान्य अर्थव्यवस्था) से रस निकाल लेता है 123 अत्यधिक अमीर और वॉलस्ट्रीट: अमेरिकी विज्ञान और तकनीक पर विनाशकारी प्रभाव 126 संघीय बैंक का 2008 से अत्यंत कम ब्याज दर रखने का नतीजा: बुलबुली अर्थव्यवस्था 129 अमेरिका के बड़े बैंक और कम्पनियाँ: इतने बड़े कि असफल नहीं होने दिया जा सकता 134 अमेरिकी आर्थिक मॉडल: भारत में लागू करने योग्य नहीं 136 डॉलर का शस्त्रीकरण (Weaponisation)और रूस-यूक्रेन युद्ध 140 वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर-विमुक्तिकरण और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव 143 जेफ बेजोज़ के $200 बिलियन: अमेरिका द्वारा चीन को दिए गए लाखों अच्छे वेतन वाले रोजगारों की राख पर खड़ी इमारत 159 द भारतीय अर्थव्यवस्था: भारत की दुखती रग: कच्चे तेल के दाम 165 वैश्विक अर्थव्यवस्था में दो प्रतिस्पर्धी मॉडल 168 अमेरिकी अर्थशास्त्री और भारतीय अर्थव्यवस्था 174 भारत का व्यापार घाटा 182 व्यापार घाटा और भारत का $2.5 ट्रिलियन की "गायब" विदेशी मुद्रा 186 मोदी प्रशासन की 'मेक इन इंडिया' नीति और नीति आयोग 190 रुपया और आइएमएफ का मुद्राओं का 'एसडीआर बास्केट'196 भारत में असमानता 198 बैंकों के 'एनपीए', 'शेयरधारक पहले' और आम आदमी 202 वैश्विक मुद्रा के रूप में चीन का युआन: भारत के लिए दुःस्वप्न 205 प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उभरता भारत 211 ह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुशंसाएँ: अनुशंसाएँ 215 निजीकरण, क्रय शक्ति और सहकारी उपक्रम 219 व्यापार अधिशेष: शीघ्रातिशीघ्र 222 आर्थिक असमानता को कम करना 228 प्रबंधन-श्रमिक समन्वय (को-डिटर्मिनेशन) 233 भारत और कीनीज़ के सिद्धांत पर आधारित प्रोत्साहन 235 भारी खपत वाली वस्तुओं में शीघ्रातिशीघ्र आत्म-निर्भरता 239 आर्थिक महाशक्ति होने के फायदे: आर्थिक प्रोत्साहन के लिए असीमित पैसा 241 प्रस्तावना: मार्च 2017 से अगस्त 2017 के बीच में मैंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत सारे लेख लिखे, जो मेरी वेबसाईट पर उपलब्ध हैं । विभिन्न चार्टों और टेबलों के जरिए मैंने ये दिखाया कि 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था गलत दिशा में चली गई, मुख्यतः भारतीय मूल के अमेरिकी (या 'आयातित') अर्थशास्त्रियों, जो अधिकतर समय उच्च पदों पर आसीन हो कर भारत की आर्थिक नीतियों का निर्धारण करते थे और उन्हें प्रभावित करते थे, के कारण । 20 मई, 2017 को मैंने 37 पृष्ठों का एक लेख, "नीति आयोग: क्यों इसे नई दिशा और नए नेतृत्व की आवश्यकता है?" (मेरी वेबसाईट पर उपलब्ध), नीति आयोग के 200 से अधिक अधिकारियों और वित्त, विदेश, वाणिज्य और व्यापार विभागों के लगभग 100 उच्च पदस्थ नौकरशाहों को भेजा ।इन अधिकारियों को मैंने मार्च 2017 से लिखे हुए सारे लेख भेजे । उस 37-पृष्ठों के लेख में 14 चार्ट और 7 टेबल हैं जिसमें पर्याप्त आर्थिक आँकड़ें उपलब्ध हैं जो नीति आयोग द्वारा आर्थिक मोर्चे पर की जा रहीं गड़बड़ियों को साबित कर रहे थे । एक वरिष्ठ भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के अनुसार, प्रधानमंत्री ने निजी तौर पर मेरे कुछ लेखों को पढ़ा और अपने लोगों के बीच उसे प्रसारित करवाया । ऐसा कहा जाता है कि उसके बाद नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पणगढ़िया ने मई 2017 में त्याग पत्र दे दिया । ये महज एक इत्तेफाक नहीं था कि डॉ पणगढ़िया ने मेरे नीति आयोग के कार्यकलापों को लेकर लिखे गए सारगर्भित लेखों के भेजे जाने के एक सप्ताह बाद, या उसके आस-पास, त्याग पत्र दे दिया । इस पुस्तक का 2018 में प्रकाशित प्रथम संसकरण मूलतः मेरे 2017 के उन लेखों पर आधारित था । इस पुस्तक के सम्पादन के लिए, मैं बड़े हर्ष के साथ धन्यवाद करता हूँ ट्रोंडओवरलैंड का; मैं धन्यवाद करता हूँ ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राज एन सिंह और पेनिसिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर दिनेश अगरवाल का विचार-विमर्श के लिए जिससे मुझे बहुत सहायता मिली । मैं सदैव आभारी हूँ मेरे पीएचडी के सलाहकार, स्वर्गीय प्रोफेसरस्टीवर्ट के कुर्टज़ का, जिन्होंने मुझे शोध करना और शोध पत्र लिखना सिखाया । मैं आभार प्रकट करता हूँ अपनी स्वर्गीय माता जी का, जिन्होंने इतने प्रकार से मुझे प्रेरित किया और मार्गदर्शन दिया, जिन्हें मैं शब्दों में नहीं कह सकता । 2023 का ये द्वितीय संस्करण 2018 के प्रथम संस्करण का अद्यतन संस्करण है, जिनमें ताजा आँकड़े, नई व्याख्याएँ और नए अध्याय भी हैं । - सुस्मित कुमार, पीएचडी

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Susmit Kumar

डॉ सुस्मित कुमार ने पेनसिल्वेनिया राज्य विश्वविद्यालय, अमेरिका से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है। अमेरिका आने से पूर्ववे विशिष्टआईएसएस की परीक्षा में उत्तीर्ष्णुए । आप पाँच पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें इस्लाम का आधुनिकीकरण और एक मल्टीपोलरवर्ल्डॉर्ड का निर्माण (2008), कैसीनो कैपिटल: द कोलैप्स ऑफ यूएस एकोनॉमी एंड द ट्राएंज़िशन टू सेक्युलर डेमोक्रेसी इन द मिडल ईस्ट (2012), और इंडिया इस नॉट ए कन्ट्री शामिल हैं। ,नोट ए कम्पनी: हाउ अंग्रेजी-अमेरिकी 'इम्पोर्टेड' इकोनॉमिस्ट्स मिसलेड एंड मिसमैनेज्ड इंडियन इकोनॉमी (2018) । 1995 में ग्लोबल टाइम्स, डेनमार्क में छपे लेखों में कट्टरपंथी इस्लाम के उदय की भविष्यवाणी की गई थी।

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