Angreji Madhyam ka bhram Jaal (Hindi)

bySankrant Sanu

Data-driven case that English-medium dominance blocks India's economic and cultural progress — with a reform roadmap.

Overview

English did not simply arrive in India — it was imposed through deliberate colonial policy that dismantled indigenous systems of learning and tied economic survival to fluency in a foreign tongue. Decades after independence, that structure remains largely intact. Sankrant Sanu's research shows why, and at what cost.

Drawing on data, case studies from a Haryana village, and comparisons with countries across Europe, Asia, Africa, and South America, Sanu builds a sustained argument: English-medium dominance in higher education, the judiciary, senior bureaucracy, and media has created a permanent underclass of non-English speakers — and has driven some to suicide when the system refused to accommodate them. The book maps how Israel, Japan, Iran, and others built world-class economies while prioritising their own languages, and what policy changes — from expanding Indian-language access in higher education to building a shared Sanskrit-rooted technical vocabulary — India would need to make a similar choice.

Sanu does not stop at diagnosis. He lays out specific reforms and places the responsibility squarely with civil society, since the policymakers who would implement change are, for now, moving in the opposite direction.

" अंग्रेज़ी माध्यम का भ्रमजाल " भारत के जन-मानस पर थोपी हुई उस औपनिवेशिक मानसिकता - जिसमें अंग्रेज़ी सर्वोपरि भाषा का दर्जा हासिल किये हुए है - की ओर ध्यान आकर्षित करती है| अपने शोध, आंकड़ों और "केस स्टडीज़" के आधार पर वे ये सिद्ध करते हैं कि अंग्रेज़ी की प्रभुता भारत के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है | पर क्या ये सोच सही है? लेखक संक्रान्त सानु सधे हुए तर्कों के आधार पर इस अवधारणा को ध्वस्त करते हैं| अपने शोध, आंकड़ों और ' केस स्टडीज़ ' के आधार पर वे ये सिद्ध करते हैं की अंग्रेज़ी की प्रभुता भारत के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है| कैसे? पाठक जब इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो पायेंगे की कैसे इतिहास में अंग्रेज़ों ने अपनी भाषा हम पर थोपी और हमें आर्थिक और सांस्कृतिक दरिद्रता के दलदल में धकेल दिया? शायद उनकी सफलता का सबसे बड़ा कारण था की उन्होंने इसे आर्थिक (नौकरी आदि) पक्ष से जोड़ दिया| और दूसरी तरफ हमारी अपनी शिक्षा-पद्धति को नेस्तनाबूद कर दिया| हम अपनी ही धरोहर से घृणा करने लगे| भारत के उच्च शिक्षा में, न्यायपालिका में, उच्च नौकरशाही में और मीडिया में अंग्रेज़ी की प्रभुता बढ़ी और साथ ही एक " अँगरेज़ मह्न्त्शाही " का निर्माण हुआ| इससे भारत के गैर-अंग्रेज़ी भाषियों में एक हीन भावना घर कर गयी, जो आज तक बनी हुई है| और, जैसा की लेखक ने इस पुस्तक में कई उदहारण दिए हैं, ये इस हद तक पहुंची की गैर-अंग्रेज़ी पृष्ठभूमि से आये युवाओं ने आत्महत्या का रास्ता अपनाया, जब उच्च शिक्षा के स्तर पर वो खुद को " अंग्रेज़ी मीडियम " में नहीं ढाल पाए| अपनी बात रखने के लिए सानु ने हरियाणा के एक गाँव में शोध किया; साथ ही वैश्विक स्तर पर कई देशों में वहाँ की मातृभाषाओं की क्या स्थिति रही, इस पर विस्तार से प्रकाश डाला है| ये पुस्तक आपको यूरोपीय और एशियाई देशों ही नहीं, बल्कि अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों की ओर भी ध्यान खींचते हैं - ये सारे देश भी औपनिवेशिक मानसिकता से जूझ रहे हैं| लेकिन, पाठक ये जानेंगे की कैसे वो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं - सिर्फ इसलिए की उन्होंने अपनी मातृभाषा की जगह औपनिवेशिक भाषा को चुना| दक्षिण अमेरिकी देश तो लगभग पूरी तरह अपनी मातृभाषा भूल चुके हैं| " अंग्रेज़ी माध्यम का भ्रमजाल " आपको ये सोचने पर मजबूर करती है की क्या भारत में भी भारतीय भाषाओँ का यही हश्र होगा? सानु अपनी बात यहीं नहीं छोड़ते| वे बताते हैं की इस विषय पर किन नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है हमारे देश में| उदहारण के लिए: उच्च शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी भारतीय भाषा में ज्ञान-अर्जन की सारी बाधाएं दूर करना; संस्कृत में एक ऐसा तकनीकी शब्दकोष तैयार करना जो अन्य भारतीय भाषाओँ (हिंदी सहित) सर्व-स्वीकार्य हो; सामाजिक विज्ञान के विषयों को भारतीय भाषाओँ को पढ़ाना आदि| इतना ही नहीं, पाठकों को इस पुस्तक में इसराइल, जापान, ईरान और अन्य कई देशों की ' केस स्टडीज़ ' मिलेंगी जिससे उन्हें ये जानने में आसानी होगी की कोई भी देश अपनी मातृभाषा को आगे रखते हुए कैसे न सिर्फ सांस्कृतिक तौर पर, बल्कि आर्थिक तौर पर भी विश्व के अग्रणी देशों में गिने जाते हैं| दरअसल, ये पुस्तक इस उम्मीद से लिखी गयी थी की इस निहायत ही जरूरी विषय पर न सिर्फ एक चर्चा शुरू हो, बल्कि जरूरी नीतिगत बदलाव भी हो| सानु कहते हैं की फिलहाल गेंद " समाज " के ही पाले में है, क्योंकि जिन्हें ये नीतियाँ बदलनीं हैं, वो शायद अभी इस स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रहे; उल्टे, अंग्रेज़ी को प्राथमिक स्तर से लागू करने के प्रयास हो रहे हैं|

Author

Sankrant Sanu photo
Sankrant Sanu

About the Author S ankrant Sanu is an entrepreneur, writer, and researcher based in Seattle and Gurgaon. He is well-known for his book ' Angezi Madhyam ka Bhramjaal ', which is the Hindi translation of the book ' The English Medium Myth: Dismantling barriers to India's growth '. The book focuses on how the country of India believes that the country can be lead to progress only with English Medium Studies and how we need to break this taboo. The English Medium Myth dismantles this idea and the best results come out only when students learn in their mother tongue. संक्रान्तसानुः कश्चन यत्नशीलः लेखकः शोधकर्ता च अस्ति । सः मायक्रोसॉफ्टसंस्थाने बहुषु अभियान्त्रिकपदेषु प्रबन्धकस्य भूमिकां निरवहत् । सः सीऐटल-कोलिफोर्निया-कनाडा-भारतेषु च बहूनि नूतनसंस्थानानि सञ्चालितवान् । दैनिक-जागरणम्, अमर-उजाला, रीडिफ, हिन्दुस्तानटाइम्ज इत्यादिषु देशविदेशानां विभिन्नेषु वृत्तपत्रेषु च तस्य लेखाः प्रकाशिताः सन्ति ।

View Author Profile
WA