Hinduon Ka Hashra

byVijay Manohar Tiwari

Itihaas se Gaayab Ankahi kahaniyan (Bharat me Islam-1)

Vijay Manohar Tiwari uses medieval Muslim chronicles to surface what Indian historians suppressed about the Turkic conquest's impact on Hindus.

Overview

After Lahore and Delhi fell to Turkic Muslim armies, what happened across the rest of India for the next eight hundred years was systematically documented by the conquerors themselves — and then, Vijay Manohar Tiwari argues, systematically hidden by post-independence Indian historians. This first volume of his 'Islam in India' series goes to those original sources: contemporary Muslim chroniclers who recorded, without apparent discomfort, what was done to Hindu populations during the Sultanate period.

Tiwari draws on those documents to show how Turkic rulers declared their intentions toward Hindus from the earliest days of Delhi's conquest, and how Islamic scholars and Sufi figures alike provided ideological direction for the suppression that followed. His central historiographical claim is that there is no 'Sultanate period' as a neutral historical category — there are only the records of what Tiwari characterises as organised terror, headquartered in Delhi and radiating outward.

This is an account for readers who want to encounter the medieval period through its primary sources rather than the interpretive consensus that, Tiwari contends, has held Indian school and university history in place for decades.

लाहौर और दिल्ली पर तुर्क मुसलमानों के कब्जे के बाद बाकी भारत ने सदियों तक क्या कुछ भोगा-भुगता है, इसके बारे में इतिहास की किताबों में परदा डालकर रखा गया। "भारत में इस्लाम" की इस रोंगटे खड़े कर देने वाली श्रृंखला में वही सत्य उजागर किया गया है, जो बीते आठ सौ सालों के दौरान समकालीन मुस्लिम लेखकों ने दस्तावेजों में दर्ज किया । इस भाग में आप देखेंगे कि किस तरह दिल्ली पर काबिज होते ही तुर्क मुसलमानों ने हिंदुओं के सफाए के इरादे जाहिर किए थे। आलिमों और सूफियों ने कैसे हिंदुओं के कठोर दमन के दिशा-निर्देश तैयार किए थे। बदकिस्मती से आजाद भारत के इतिहासकारों ने भारत में इस्लाम के फैलाव की इस घृणित सच्चाई को छुपा कर रखा। लेखक का मानना है कि मध्यकाल के इतिहास में सल्तनत और मुगलकाल जैसे कोई कालखंड नहीं हैं। वह अपने समय के दुर्दात आतंकियों और अपराधियों का इतिहास है, जो दिल्ली को अपना अड्डा बनाकर बैठ गए थे...

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Vijay Manohar Tiwari

About the Author विजय मनोहर तिवारी ने पच्चीस साल प्रिंट और टीवी में खपाए हैं। खबरों की खंती में खुदाई का काम, जिससे टिकाऊ ज्यादा कुछ नहीं निकलता। लेकिन किताबों के हिंदी पाठकों की दरिद्रता के कारण चूल्हा जलाने के लिए मीडिया की मनरेगा का जाॅब कार्ड जरूरी था। खबरों के सिरे पकड़कर भटकने के शौक में छह-सात किताबें निकलीं। इनकी बदौलत मिले पुरस्कार-सम्मान बक्सों में रखे हैं। सबसे बड़ा सम्मान उस कहानी को मानते हैं, जिसमें कथाकार कमलेश्वर ने उन्हें एक किरदार बनाकर पेश किया था। यह बिजली के लिए बड़े बांध में डूबे एक कस्बे की दास्तान है, जिस पर टीवी के लाइव कवरेज पर केंद्रित किताब 'हरसूद 30 जून' साल 2005 में छपी थी। गैस हादसे में भोपाल में 15 हजार लाशें गिरी थीं, लेकिन लिखा न के बराबर गया। हादसे की पच्चीसवीं बरसी पर खबरों से ही निकली किताब है-'आधी रात का सच।' इसके अलावा 'प्रिय पाकिस्तान', 'एक साध्वी की सत्ता कथा' और 'राहुल बारपुते' दीगर किताबें हैं। ठहराव को खतरनाक मानते हैं इसलिए लगातार डोलते रहे हैं। भारत की सघन आठ परिक्रमाओं के दौरान ट्रेनों में लिखी किताब है-'भारत की खोज में मेरे पाँच साल।' दो-एक संस्करणों के बाद ये किताबें बाजार से लुप्त हैं। नश्वर संसार के सारे पते अस्थाई हैं। संपर्क के लिए ईमेल और आभाषी दुनिया है, लेकिन फेसबुक और ट्विटर पर तफरीह उतनी ही है, जितना सरकारी दफ्तरों में साहबों की मौजूदगी या शपथ के बाद सदन में माननीयों की पावन उपस्थिति। दो-तीन और किताबों ने उलझाया हुआ है। इनमें मीडिया के अनुभवों का जखीरा ज्वलनशील होगा। समय का हर टुकड़ा कीमती है। कौन जाने दुष्ट कोरोना कब घात लगा दे। काफिरों को अल्लाह बचाए...

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