Rukka Bai ka Kotha

byRavindra Shrivastava

Save Women Read RUKKA BAI KA KOTHA

Nimmo enters a kotha at twelve — a novel of exploitation, disease, and the survival instinct that refuses to be extinguished.

Overview

Nimmo was twelve years old when she was put in the kotha. What followed — the nightly performances, the diseases that moved silently through the rooms, the bodies wrapped in sheets and buried in scrubland behind Sonamandi before dawn — forms the raw material of this novel. Ravindra Shrivastava does not look away: customers unaware that a corpse lies under the very cot they occupy, girls in the next room burying their grief before appearing on the street again by evening, the cycle of spectacle and suffering running without pause.

The novel holds two realities at once. The world of the kothas is rendered with unflinching physical detail — the diseases, the deception, the mechanics of exploitation. But at its centre is Nimmo's own will to survive, her jijivisha, which refuses to be extinguished even as the structure around her is designed to consume her. The tension between these two forces — the system that brutalizes and the self that persists — is what keeps the narrative moving.

For readers who can bear witness to difficult truths, this is a story that refuses to let the women of Sonamandi remain invisible.

-:किताब के बारे में:- तब आधी रात के बाद घुप्प अंधेरे में, इन्हीं कोठों के भीतर से ला इलाज गनोरिया, सिफलिस आदि जानलेवा रोगों के काले कफन ओढ़े धंधेवालियों की लाशें बड़े ही गुप्त ढंग से निकलतीं। कोठों के भीतर उनकी साथिन धंधेवालियां आदि अपने सीने पीटती, रुदन को सीने के भीतर ही दफन कर सूनी आंखों से उन्हें चुपचाप अंतिम विदाई देतीं। उनकी असह्य पीड़ादायक मौत से मर्माहत पहलवान व दलाल नम आंखों उनकी लाशों को कंधे पर लादे, सबकी नजरें बचाते निकलते और चुपचाप सोनामंडी के पिछवाड़े की तरफ स्थित सुनसान, झाड़ों पेड़ो से घिरे बियावान में जा कर उनकी लाशें दफन कर आते। दूसरे दिन शाम होते ही लड़कियां सज-धज कर अंग-प्रदर्शक उत्तेजक कपड़े पहने बाजार या सड़क पर खड़ी हो ग्राहकों को पटाने में जुट जातीं। कभी अश्लील, उत्तेजक इशारे करतीं तो कभी पल भर को अपने अंग पर से कपड़ा हटा कर उन्हें ललचाती- यह जानते हुए भी कि एक दिन उनका भी ऐसा ही, शायद इससे भी भयानक व दुखद, अंत होने वाला है। इन्हीं कोठों के किसी केबिन में किसी धंधेवाली के साथ अपने खोखले पौरुषत्व का बल- प्रदर्शन करते ग्राहक को पता ही नहीं रहता कि उसी चारपाई के नीचे चादर से ढंकी एक धंधेवाली की लाश छिपा कर रखी है और चारपाई के ऊपर लेटी लड़की उसे, कुछ रुपयों के बदले, दैहिक सुख के साथ-साथ सिफलिस, गनोरिया के प्रसाद भी दे रही है। कोठों और धंधेवालियों की दारुण जिंदगी, शारीरिक शोषण, सड़ांध भरी दुनिया की भयावनी तस्वीरें उकेरती निम्मो की, जिसे 12 वर्ष की उम्र में कोठे पर बिठा दिया गया था, बदनसीबी और जिजीविषा की, मन को बुरी तरह से झकझोरने व गहराई तक छू लेने वाली रोमांचक दास्तान, जो हर पल आपको बांधे और आपके दिलोदिमाग को कुरेदती और बेचैन बनाये रखती है...

Author

Ravindra Shrivastava

रवीन्द्र श्रीवास्तव (जन्म 1 जून, 1943) इलाहाबाद विवि से 1965 में एमए, लिंग्विस्टिक स्ट्रक्चर ऑफ हिदी जर्नलिज्म' विषय पर पीएचडी केलिए शोध- कार्य, लेकिन 'धर्मयुग व अन्य कामों में अति व्यस्तता के कारण अधूरा | अब इसी विषय पर पुस्तक । 1963 से 'दैनिक भारत' (इलाहाबाद) में पत्रकारिता की शुरुआत । 'धर्मयुग', 'नवभारत टाइम्स' (उपसंपादक), 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' (सहायक संपादक), 'नवभारत' (समाचार संपादक), फिर 'वनिता भारती', 'शिक' (महिला पत्रिकाएं), 'बायस्कोप' (फिल्म पत्रिका) एवं अन्य पत्रिकाओं के संपादक । मित्र प्रकाशन (माया मनोरमा, मनोहर कहानियां, प्रोब इंडिया आदि) के ब्यूरो चीफ अंत में 'लोकस्वामी' प्रकाशन समूह में प्रधान संपादक। संप्रति फ्रीलांस पत्रकारिता के साथ-साथ कई पत्र पत्रिकाओं के सलाहकार संपादक । धर्मयुग में व्यंग्य स्तंभ के प्रमुख के रूप में डेढ़ दर्जन से भी व्यंग्यकारों को राष्ट्रीय स्तर पर लाने का श्रेय । लेखन की शुरुआत कहानी, कविता, व्यंग्य, अंतर्राष्ट्रीय विषयों से हुई । 'धर्मयुग' में आने के बाद लेखन की धारा दूसरी तरफ मुड़ गयी अब तक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, अपराध, फिल्म से ले कर तमाम विषयों पर बीस हजार से अधिक रचनाएं प्रकाशित एवं अनुदित | भारत-चीन युद्ध पर आधारित प्रथम उपन्यास 'युद्धबंदी' 1963-64 में लिखा । 'स्मगलिंग' 1973 में प्रकाशित, दूसरे ही वर्ष देश में 'मीसा' लग जाने से काफी लोकप्रिय और रिकॉर्ड बिक्री। स्मगलिंग पर किसी भी भारतीय भाषा में तब छपी पहली पुस्तक । स्व. मदन मोहन वर्मा विशिष्ट सम्मान एवं अन्य पुरस्कारों से सम्मानित ।

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