Ek Forest Officer Ki Diary

byS. R. Rawat (IFS Retd.)

37 varsh ki seva kaal uparant sevanivritt Pradhan Mukhya Van Sanrakshak ke jangalon ke khatte meethe sansmaran

A retired IFS officer's memoir of 37 years across MP, Maharashtra, and Chhattisgarh — wildlife, forest conservation, and field realities.

Overview

Thirty-seven years in the Indian Forest Service across Maharashtra, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh — from training at Forest College to retirement as Principal Chief Conservator of Forests, MP — gave S. R. Rawat a body of field experience that few institutions can replicate. This memoir records it through short, true stories: encounters with wildlife, the daily grind of forest surveyors working remote terrain, the bureaucratic resistance that accompanied conservation work, and the moments of unexpected grace that made the career worthwhile.

Among the most distinctive elements are the field-based management plans Rawat designed for the Seoni and Balaghat forest divisions — five-year plans grounded in direct observation rather than desk calculation. These were not administrative formalities; they shaped how those forests were managed for the decade and more that followed. The memoir treats them not as achievements to list, but as examples of what sustained attention to a landscape actually produces.

For readers curious about what a life inside India's forest bureaucracy genuinely looks like — the difficulty, the isolation, and the conservation that quietly happens despite the odds — this is a rare and candid account.

-:पुस्तक परिचय:- भारतीय वन सेवा के मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, श्री एस. आर. रावत के 37 वर्षों के सेवाकाल का, यह संस्मरण एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह पुस्तक फॉरेस्ट कॉलेज की प्रशिक्षण अवधि से लेकर सेवानिवृति तक की लगभग चार दशकों की यात्रा का प्रमाणिक वर्णन प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में, प्रकृति के सान्निध्य में बिताए गए अविस्मरणीय क्षणों, वन्यजीवों, विविध मैदानी चुनौतियों के प्रत्यक्ष अनुभवों का व्यापक चित्रण, छोटी-छोटी सच्ची कहानियों के माध्यम से किया गया है। इस पुस्तक में लेखक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विविध वन क्षेत्रों में किए गए वानिकी कार्यों तथा संरक्षण प्रयासों से जुड़े अपने गहन अनुभवों से अवगत कराते हैं। चुनौतीपूर्ण कठिनाइयों के बीच, वनों के सर्वेक्षण सीमांकन, और फील्ड वर्क के आधार पर तैयार की गई कई योजनाएँ इस पुस्तक की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक हैं। ये योजनाएँ केवल कागजी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि ऐसे दूरदर्शी खाके हैं जिन्होंने आने वाले दस से पंद्रह वर्षों तक वन प्रबंधन की दिशा तय की। सिवनी और बालाघाट वन मंडलों के लिए बनाई गई 5 वर्षों की अवधि की फील्ड आधारित योजनाएँ श्री रावत द्वारा निर्मित ये योजनाएँ उनके व्यावसायिक कौशल, वनों के प्रति गहरी निष्ठा का सशक्त प्रमाण हैं। इन योजनाओं ने वनों के प्रबंधन को नई दिशा दी। "एक फॉरेस्ट ऑफीसर की डायरी" वन कर्मचारियों की रोज़मर्रा की कठिनाइयों को, विशेष रूप से प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए उपयुक्त है जो वनों के महत्व को समझते हैं, वन सेवा के कठिन जीवन को करीब से जानना चाहते हैं, या केवल एक वन अधिकारी की प्रेरणादायक यात्रा से जुड़ना चाहते हैं। यह दस्तावेज़ श्री एस. आर. रावत के वन अधिकारी के रूप में कठिनाइयों भरे जीवन और वनों के प्रति उनके अटूट प्रेम का जीवंत प्रमाण है।

Author

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S. R. Rawat (IFS Retd.)

सागर, मध्य प्रदेश में जन्मे, यूनिवर्सिटी आफ सागर, जो अब हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, से प्योर और अप्लाइड मैथमेटिक्स और फिजिक्स विषय लेकर वर्ष 1953 में बी.एससी. की परीक्षा मेरिट में उत्तीर्ण करने के पश्चात सहायक वन संरक्षक के पद के लिए सिलेक्ट होने के उपरांत भारतीय वन महाविद्यालय देहरादून की दो वर्षीय फॉरेस्ट ऑफीसर्स प्रशिक्षण 1954-56 बैच में पूर्ण कर ए.आई.एफ.सी. डिप्लोमा प्राप्त किया। वन विभाग और वानिकी कार्यों से लगभग 37 वर्ष तक जुड़े रहने के उपरांत वर्ष 1991 में प्रधान मुख्य वन संरक्षक मध्य प्रदेश के पद से सेवानिवृत हुए। प्रधान मुख्य वन संरक्षक मध्य प्रदेश के पद पर रहते हुए, प्रबंध निदेशक मध्य प्रदेश राज्य वन विकास निगम के अतिरिक्त प्रभार पर भी रहे। सेवानिवृत्ति की तिथि के पूर्व ही मध्य प्रदेश शासन द्वारा 6 माह की सेवा वृद्धि दी गई। उस समय प्रदेश में केवल एक ही प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यरत थे। शासकीय सेवा अवधि में विभिन्न पदों पर रहते हुए चंद्रपुर(अब महाराष्ट्र), बालाघाट, सिवनी, सीहोर, छिंदवाड़ा, बिलासपुर (अब छत्तीसगढ़), बैतूल, ग्वालियर, सागर, दमोह, जबलपुर, रीवा और भोपाल जिलों के वनों और वानिकी कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सीहोर जिले में वर्ष 1959 से 1961 अर्थात 2 वर्षों तक वनों का सर्वेक्षण, डिमार्केशन और क्षेत्र वर्क कर आगामी 10 वर्षों के लिए क्रियान्वयन हेतु कार्य योजना प्रस्तुत की। इसी तरह ग्वालियर फॉरेस्ट डिविजन जिसमें ग्वालियर, दतिया और भिंड जिले के वन क्षेत्र सम्मिलित थे में वर्ष 1972 से 1975 अर्थात 3 वर्षों तक वनों का सर्वेक्षण डिमार्केशन और क्षेत्र वर्क कर अगले 15 वर्षों में कार्य करने के लिए कार्य योजना प्रस्तुत किया जो मध्य प्रदेश शासन वन विभाग द्वारा दिनांक 8 अगस्त 1975 को अनुमोदित किया गया। वानिकी क्षेत्र से जुड़े कई विषयों पर रिपोर्ट्स और लेख प्रस्तुत किये। वन विभाग द्वारा संचालित प्रशिक्षण शालाओं के संचालन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। टेनिस और ताश का खेल ब्रिज खेलने की हॉबी होने के कारण अरेरा क्लब भोपाल के इंटर और इंट्रा क्लब ब्रिज टूर्नामेंट की कई स्पर्धांओं में पुरस्कार प्राप्त किये। सेवानिवृत्ति उपरांत मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के संचालक मंडल में सेवाएं देने के साथ ही सेंट्रल और ऑल इंडिया सर्विसेज पेंशनर्स एसोसिएशन भोपाल में उपाध्यक्ष और सी.जी.एच.एस. एडवाइजरी कमेटी में लगभग 4 वर्षों तक कार्यरत रहे। इसी तरह एम.पी. कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी की एग्जीक्यूटिव कमेटी और अरेरा क्लब की डिसीप्लिनरी कमेटी में रहते हुए आवश्यक योगदान दिया।

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