Jane-Anjane Padchinh

byMadhuresh Mishra

Hindi poetry on self-reliance, diaspora longing, and patriotism by a poet who has lived abroad for decades.

Overview

Every footstep a person leaves behind tells a story — of the path chosen, the blind alleys avoided, the roads made by walking. Madhuresh Mishra's debut collection, written across decades of life abroad, takes that image as its central thread. The title poem, 'Padchinh', argues against imitation and for the courage of making one's own way: a message that runs quietly through the entire book.

Mishra writes about life's struggles and small victories, about family and memory, about the particular homesickness of a diaspora poet who has lived far from India for years yet never loosened his grip on the language. Poems like 'Pravasi Bhartiya' and 'Hum Deshi, Videsh Mein' give voice to the interior life of those who carry a country inside them even as they inhabit another. The collection has drawn praise from Padma Shri Alok Mehta, who notes its directness and depth, and from Padma Shri Dr. Soma Ghosh, who singles out 'Kaarya Hi Vishram' as capturing the spirit of the book.

For readers who have felt the pull of two worlds, or who want Hindi verse that speaks plainly and lands hard, these are poems worth sitting with.

'जाने-अनजाने पदचिह्न' एक प्रेरणादायक काव्य संग्रह है, जो जीवन के संघर्ष, सफलता, परिवार, अनुभवों और देशभक्ति की भावनाओं को उजागर करता है। संग्रह की शीर्षक कविता 'पदचिह्न' आत्मनिर्भरता का संदेश देती है, जिसमें कवि अंधानुकरण से बचकर अपनी राह स्वयं बनाने की प्रेरणा देता है। कई दशकों से विदेश में निवास के बावजूद, कवि की मातृभूमि और भाषा के प्रति गहरी आस्था स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। सरल और प्रभावशाली भाषा में रचित ये कविताएँ पाठकों को जीवन को एक नये दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देती हैं। 'काव्य संग्रह की प्रत्येक रचना एक नए विचार, नई दृष्टि और सोच को जन्म देती है। लेखनी में सरलता, सादगी और गहराई का अनोखा संगम है, जो सीधे पाठक के दिल तक पहुंचने की शक्ति रखती है।' पद्म श्री आलोक मेहता (संपादक लेखक) 'पदचिह्न, कार्य ही विश्राम जैसी कविताएँ इस पुस्तक की आत्मा हैं। प्रवासी भारतीय और हम देशी, विदेश में जैसी कविताएँ प्रवासियों के अंतर्मन की भावना और देश प्रेम बखूबी प्रकट करती हैं।' पद्म श्री डॉ. सोमा घोष (हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका) 'काव्य संग्रह 'जाने-अनजाने पदचिह्न' की कविताएँ जीवन के जाने-अनजाने पहलुओं का सुंदर वर्णन कर पाठकों को प्रेरित करने के साथ-साथ नई दृष्टि भी प्रदान करेंगी।' सतीश महाना (अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधान सभा)

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Madhuresh Mishra

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में जन्मे मधुरेश मिश्रा, पिछले दो दशकों से अधिक समय से लंदन में निवास करते हुए, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) परामर्श और बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं और वरिष्ठ नेतृत्व की भूमिकाओं में भी सक्रिय हैं। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार इंजीनियरिंग में स्नातक (बीई) और व्यवसाय प्रबंधन में स्नातकोत्तर (एमबीए) की शिक्षा प्राप्त की है। वे ब्रिटेन में उत्तर प्रदेश के लोगों को एकजुट करने एवं प्रदेश की समृद्ध संस्कृति, भाषा, विरासत और उपलब्धियों का प्रचार करने वाले संगठन "यूपीका, यूके" के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। इसके साथ ही, वे ब्रिटेन-भारत संबंधों को प्रोत्साहित करने और ब्रिटेन में भारत की सकारात्मक छवि को सुदृढ़ करने वाले एक प्रमुख और प्रतिष्ठित संगठन के प्रमुख भी हैं। वे नियमित रूप से रक्तदान करते हैं और हिंदी भाषा को बढ़ावा देने सहित विभिन्न सामाजिक व नि:स्वार्थ सेवा कार्यों में सक्रिय हैं। ईमेल: madhureshs@yahoo.com

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