When 24-hour news channels arrived in India around 2001, journalism's relationship with power was already complicated. Manish Thakur's account of the two decades that followed is a chapter-by-chapter reckoning with what the fourth estate actually did with its reach — from the 2G spectrum and coal allocation scandals to NDTV's hawala connections and a 642-crore income-tax penalty against Prannoy Roy, from coverage biased along caste and religious lines to the rise of web portals like The Wire, The Quint, and The Caravan staking out their own contested positions.
Thakur's argument is that mainstream media neither fully fought nor fully surrendered to power — it navigated, strategised, and in doing so revealed structural entanglements that ideology alone cannot explain. The arrival of social media reshuffled the deck again, amplifying nationalist voices, enabling citizen journalism, and raising unresolved questions about regulation and responsibility.
Journalism students will find this a frank corrective to hagiographic press histories. Practitioners will recognise the pressures described. Anyone who watches Indian news and wants to understand the incentives shaping what they see will find the factual record here harder to dismiss than opinion.
यह पुस्तक सन 2001 के दौर में चौबीस घंटे के चैनलों की शुरुआत के बाद भारतीय पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को समझने का एक प्रयास है!लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की जिम्मेदारी क्या रही है और एजेंडा के तहत पत्रकारिता के जुनून में क्या जिम्मेदारी निभाई गई है यह किताब उसी पर एक तथात्मक रिपोर्ट है! सोशल मीडिया के दौर में मेनस्ट्रीम मीडिया कहाँ है और उसके लिए चुनौती क्या है? इन चुनौतियों के सामने उसने संघर्ष किया या समर्पण! इस पर चर्चा जरुरी है!पत्रकारिता के छात्र के लिए यह समझना जरुरी है कि पत्रकारिता के इतिहास को जानकर उसके वर्तमान से आँखें नहीं मूंदी जा सकती है. Contents पहला अध्याय क्रोनी कैप्टलिज़्म और लुटियन मीडिया सत्ता और मीडिया: किसने कितनी निभाई जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की बनाई एसआईटी की रिपोर्ट को भी खारिज करती रही मीडिया ! वह साक्षात्कार, जिसके बाद नरेंद्र मोदी ने मीडिया से दूरी बना ली..... दूसरा अध्याय कोयला खाती और हवा निगलती मीडिया 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कोयला घोटाला राष्ट्रमंडल खेल घोटाला कैश फॉर वोट मामला तीसरा अध्याय एनडीटीवी और हवाला कारोबार कारोबारी प्रणय राय का अपनों से छूटता नाता सीबीआई के चंगुल से एनडीटीवी की मुक्ति और नैतिक सरोकार से टूटता नाता चैनल के एंकर की आईआरएस पत्नी पर लगा आरोप प्रवर्तन निदेशालय की गिरफ्त में एनडीटीवी एनडीटीवी पर आयकर विभाग द्वारा 642 करोड़ रुपये का जुर्माना प्रणय राय के सामने एनडीटीवी नामक उनका साम्राज्य बिखरने लगा चतुर्थ अध्याय वेब लड़ाके कुलभूषण पर द क्विंट 'द कारवां' द वायर अपनी मानहानि को लेकर जय शाह ने अदालत में की शिकायत.... द प्रिंट पांचवा अध्याय सोशल मीडिया से बदली भारतीय राजनीति सोशल मीडिया और कानून व्यवस्था का मसला सोशल मीडिया ने हमारी जिंदगी बदल दी अंकुश लगाने के बाद भी लगातार बढ़ती जा रही है ताकत आम और खास के गुस्से का इजहार भी सोशल मीडिया पर.. सोशल मीडिया और राष्ट्रवाद का उभार छठा अध्याय मेन स्ट्रीम मीडिया और पूर्वाग्रह से भरी रिपोर्टिंग सजायाफ़्ता लालू के प्रति मीडिया की हमदर्दी के मायने गुजरात दंगा और लुटियन मीडिया मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से रोकने के लिए मीडिया ने कैसे की साजिश ! जाति और मजहब से खबरों को रंगती मीडिया ! सीट को लेकर हत्या में मजहब का रंग सातवा अध्याय राष्ट्रवादी पत्रकारिता की आड़ में शरारत का खेल सनसनीखेज महत्वपूर्ण तथ्य और खिलवाड़ राष्ट्रवाद का कंबल ओढ़कर घी पीने वाले सुधीर चौधरी प्रणय राय NDTV अडानी का और रवीश कुमार की नैतिकता का प्रदर्शन एनडीटीवी, रवीश कुमार और गोदी मीडिया का सच